
आज के दौर में पूरा विश्व नरसंहार देख रहा है। विश्व शक्तियां अपने भय को कायम रखने के लिये छोटी ताकतों को अपना शिकार बना रही हैं। इस कत्लेआम का शिकार सबसे ज्यादा मुसलमान हो रहे हैं। देखने में तो हर लड़ाई के लिए मुसलमानों को ही जिम्मेदार बताया जाता है लेकिन हकीकत कुछ और ही है। दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति तथा पश्चिम सभ्यता को नेतृत्व कर रहे अमेरिका के एक जिम्मेदार नेता का कहना है की सोवियत यूनियन के टूटने के बाद हमारा दुश्मन केवल और केवल इस्लाम है। अमेरिका और उसके साथी जो दुनिया में पूंजीवाद को बढ़ाना चाहते हैं उनको ये लगने लगा है की इस्लाम ही उनके मकसद में सबसे बड़ा रोड़ा है। अपने मंसूबो को पूरा करने के लिए ये शक्तियां एक एक करके मुस्लिम मुल्कों को शिकार बना रही हैं। जो मुस्लिम मुल्क भी मजबूत होता है उसे ही बरबाद करने के लिए अमेरिका और उसके पिछलग्गू खड़े हो जाते हैं। इराक, अफगानिस्तान के बाद अब इरान पर नजरें जम रही हैं और साथ ही पाकिस्तान भी निशाने पर आने लगा है। मुस्लिम मुल्कों की इस हालत को देख कर अफसोस होता है। सवाल ये है की मुसलमानों की इस हालत के लिए क्या केवल गैर मुस्लिम ही जिम्मेदार हैं। नहीं, बल्कि खुद मुसलमान जिम्मेदार हैं। मुसलमानों में (कपटाचारियों) मुनाफिकों की कमी नही है। मुनाफिक इस मायने में की जब इस्लाम को किसी भी देश के संविधान के रूप में लागू करने की बात की जाती है तो वह इसके खिलाफ हो जाते हैं। वह इस्लाम को रोजे और नमाज़ तक सीमित कर देना चाहते हैं लेकिन जब इस्लाम की किसी व्यवस्था की बात की जाती है तो उन पर मुसीबत के पहाड़ टूटने लगते हैं। वह शैतान के अनुयायी बन जाते हैं। वह ऐसी किसी भी कोशिश के विरुद्ध हो जाते हैं जो इस्लाम को विधान के तौर पर लागू करने के लिए की जाती है। ऐसे लोगों की तादाद मुसलमानों में कम नही हैं बल्कि बहुत बड़ी संख्या में ये लोग मौजूद हैं। इन लोगों ने इस्लाम को सही मायनों में समझा ही नहीं। वह इस्लाम को दूसरे धर्मों की तरह ही एक धर्म समझते हैं। उन्हें नहीं पता की इस्लाम एक जिंदगी गुजारने का तरीका है। अभी दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही है। इसकी वजह सिर्फ ब्याज आधारित कारोबार है। अगर इस्लाम के मानने वाले अपनी इस जकात व्यवस्था को दुनिया के सामने लायें तो विश्व को ऐसी परेशानियों से निजात मिल सकती है। लेकिन हमारे पढ़े लिखे लोग खुद इस्लाम की किसी व्यवस्था को जानते तक नहीं। वक्त आ गया है की मुसलमान इस्लाम को व्यवस्था के रूप में लेकर उस पर अमल करें और दूसरों की भी इस्लाम की जानकारी दें। कुरान का अध्ययन करें और हर ऐसी कोशिश का समर्थन करें जो कुरआनी व्यवस्था जो न्याय आधारित व्यवस्था है उसे लागू करने के लिये की जा रही हो।