Saturday, January 27, 2007

ग़ज़ल (माजिद कैलाशपुरी)

वो लब के जिन से जाम कि लज़्ज़्त नसीब हो

वो ज़ुल्फ़ जिससे मुशक कि खुश्बु नसीब हो

वो खुद ही एक फूल है खिलता गुलाब है

चेहरा भी उसक नूर भरा महताब है

दीदार से ही जिसके तस्कीन हो मेरी

तारीफ़ जिसकी करके निखरती है शायरी

ज़िन्दा मिसाल है वह हुस्नो शबाब कि

मलका है मेरी जागती आन्खो के ख्वाब की

Tuesday, January 9, 2007

गीत (माजिद कैलाशपुरी)

तुम हुस्न बेमिसाल अदा लाजवाब हो
कलियों की हो तमन्ना तो फूलों का ख्वाब हो।

नाज़ुक सा ये बदन ये तबस्सुम की बिजलियाँ
तारीफ जिसकी करती है ये सारी कहकशां
करता है जिससे प्यार चमन वोह गुलाब हो।
तुम ....................
कलियों .....................

रंगत अजब सी तुम में है जो फूल में नही
आँखों में जो चमक है वोह कोहिनूर में नही
पी जाए बस नज़र से जो तुम वोह शराब हो।
तुम .....................
कलियों ......................

कैसे करू तलाश किसी एक हसीन को
ढूँढा करू मैं कैसे किसी नाजनीन को
माजिद के हर सवाल का तुम ही जवाब हो।
तुम ....................
कलियों .....................