Saturday, January 27, 2007

ग़ज़ल (माजिद कैलाशपुरी)

वो लब के जिन से जाम कि लज़्ज़्त नसीब हो

वो ज़ुल्फ़ जिससे मुशक कि खुश्बु नसीब हो

वो खुद ही एक फूल है खिलता गुलाब है

चेहरा भी उसक नूर भरा महताब है

दीदार से ही जिसके तस्कीन हो मेरी

तारीफ़ जिसकी करके निखरती है शायरी

ज़िन्दा मिसाल है वह हुस्नो शबाब कि

मलका है मेरी जागती आन्खो के ख्वाब की

1 comment:

Unknown said...

patther ke hi khuda hai patther ke hi insan paye hai,tum saher mohabbat kahte ho,hum jaan bacha kar bage hai