Monday, August 31, 2009

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इन रहस्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न पहलू हैं। जब तक इन तमाम पहलुओं को सामने नहीं रखा जायेगा पूरी तस्वीर नहीं बन सकती। इसका एक पहलू यह भी है कि ये केवल भारत की घटना थी। इसके संबंध अनगिनत बातें कही जा सकती हैं। केवल इसे एक देश की एक घटना नहीं कहा जा सकता। इसका सीधा संबंध वर्तमान में भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन से है। लेकिन इसका विस्तृत अध्ययन किया जाये तो यह एक वैश्विक मामला है। चूंकि इसका संबंध बांग्लादेश से भी है और अफगानिस्तान से भी। नेपाल से भी कहीं न कहीं इसका संबंध निकल आता है। इस पूरे मामले से पूर्व की एक साम्राज्यवादी विश्व शक्ति बड़ी गहराई से जुड़ी हुई थी इसलिये भी इसकी कडिय़ां दूर-दूर जाकर मिलती हैं। दक्षिणी अफ्रीका का भी इस आंदोलन से रिश्ता निकल आता है।
इस आंदोलन की अवधि बहुत लंबी रही है। क्योंकि देश को आजाद कराने की कोशिशें तो अंग्रेजों के भारत पर वर्चस्व स्थापित हो जाने पर ही शुरू हो चुकी थीं, बंगाल पर ईस्ट इंडिया कंपनी के छा जाने के साथ ही विदेशी कब्जे से आजाद होने की इच्छा देशप्रेमियों के दिलो दिमाग में करवट लेने लगी थी। इसलिये 1857 की लड़ाई को भी स्वतंत्रता की लड़ाई कहा जाता है। टीपू सुल्तान के संघर्ष को भी इसी हिस्सा कहा जाता है। याद रहे कि टीपू सुल्तान ने फ्रांस को मदद के लिये पुकारा था इसलिये इसमें इसकी दिलचस्पी भी पैदा हो गयी थी मगर कुछ कारणों से फ्रांस ने इस बात को स्वीकार नहीं किया था। लेकिन टीपू के फ्रांस से संबंध बने रहे। एक तरफ अंग्रेज बहादुर अपने पंजे मजबूती से गाडऩे की कोशिश कर रहा था दूसरी तरफ इससे छुटकारा हासिल करने के स्थानीय प्रयास भी हो रहे थे। इस दौरान प्रथम विश्व युद्ध की घटना हो जाती है जिसके सिलसिले में अंग्रेजों को यह शंका थी कि इसमें भारतीय इसका साथ देंगे या नहीं, लेकिन इतिहास यह बताता है कि भारतीयों ने अंग्रेजी साम्राज्यवादियों का भरपूर साथ दिया। इसका प्रमाण यह भी है कि यूरोप, अफ्रीका और मध्य पश्चिम के विभिन्न मोर्चों पर 13 लाख भारतीय सैनिकों और मजदूरों ने अंग्रेजों के हितों की रक्षा की। इसके दुश्मनों से लोहा लिया। यही नहीं बल्कि यहां के बड़े छोटे हिंदू व मुसलमान जागीरदारों, नवाबों और राजा महाराजों ने दिल खोलकर अंग्रेजों की धन से, अनाज से और गोलाबारूद तथा दूसरे सैन्य सामान से सहायता की। अर्थ यह कि इस अवसर पर भारतीयों ने अंग्रेजों से पूरी निष्ठा का परिचय दिया। ये इस आंदोलन का एक वैश्विक पहलू है। अंग्रेज बहादुर को जो हानि पहुंची इसमें भी भारतीय बराबर के शरीक थे।
ये स्वतंत्रता आंदोलन विदेशी ताकतों से आजादी हासिल करने के लिये था इसलिये इसमें एक स्तर पर दो भूमिकाएं नजर आती हैं, यानी अंग्रेज और भारतीय लेकिन दूसरे स्तर पर भारतीयों के अनगिनत समूह हैं और दूसरे विदेशी तत्वों में अंग्रेजों के अलावा दूसरी शक्तियां जिनमें अमेरिका, जर्मनी उल्लेखनीय हैं। टर्की भी किसी न किसी स्तर पर नजर आता है। वह सीधा इसमें शामिल नहीं बल्कि कहीं न कहीं शामिल जरूर था। स्पष्टï है कि इन सब शक्तियों के हित भी इसमें शामिल हो जाते हैं।
गांधी जी जब अफ्रीका से भारत आये तो अफ्रीका में जो आंदोलन चल रहा था उसका संबंध भी यहां के आंदोलन से हो गया। इस कारण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक पहलू यह भी है और इसे अलग करके नहीं देखना चाहिए। यह मामला अब भारत का नहीं बल्कि पूरे विश्व का हो जाता है। इस कारण जब भारत विभाजन, स्वतंत्रता व मुहम्मद अली जिन्ना की बात की जाती है तो इसमें विदेशी दिलचस्पी पैदा होना स्वाभाविक है और इनकी भूमिका की चर्चा भी जरूरी है। इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता इसलिये ये भी देखना चाहिए कि आजादी के इस आंदोलन में भारतीयों के बलिदान अपनी जगह, स्वयं पूर्व साम्राज्यवादी शक्ति की मर्जी उसकी नीतियों और वैश्विक परिस्थितियों को कितना दखल है। इसलिये अंग्रेज किसी भी कीमत पर भारत छोडऩे को तैयार नहीं थे। इसलिये कि इन के लिये सोने की चिडिय़ा थी। लेकिन प्रकृति के अपने मंसूबे थे। इस दौरान दो विश्व युद्ध हो गये जिससे इस विश्व शक्ति का घमंड टूट गया। अंग्रेजी साम्राज्य का सूरज जब ढलने लगा और इसकी ताकत कमजोर पडऩे लगी तो इसके लिये कब्जाये हुए क्षेत्र बोझ बन गये। इनके प्रबंध में भी मुश्किल आने लगी इसके कारण स्वयं अंग्रेजी समाज भी विभिन्न खराबियों से दोचार हो गया। बल्कि यूं कहें कि अब तबाही उनके करीब आने लगी। विशेषरूप से सामाजिक समस्याएं पैदा होने लगी साथ ही राजनीतिक हलचल भी हुई। जब ब्रिटेन में 1945 के आम चुनाव हुए और लेबर पार्टी की सरकार बनी जिसकी कमान क्लिमेंट रिचर्ड इटली ने संभाली तो इसने नई बस्तियों के संबंध में एक योजना बनायी जिसे डिकोलोनाइजेशन की नीति कहा जाता है। यानी ब्रिटेन ने नई बस्तियों को आजादी का परवाना दिया। इसने भारत के बारे में यह फैसला किया कि इसे आजाद करना है और खास इसी उद्देश्य के लिये लार्ड माउंट बेटन को विशेष प्राधिकार देकर भारत का वॉयसराय नियुक्त किया था। वह इसी विशेष मिशन पर यहां भेजे गये थे कि वह भारत जाकर वहां के नेताओं से इस बारे में बातचीत करें। इस दृष्टिïकोण से देखा जाये तो स्वतंत्रता और विभाजन के सिलसिले में सभी अहम फैसले इसी के नजर आते हैं। इसको भी मद्देनजर रखने की जरूरत है। स्वतंत्रता आंदोलन का एक मुख्य बिंदु आजाद हिंद फौज भी है। ये फौज जिस तरह गठित की गयी और इसके विदेशी संपर्कों का बखुबी अंदाजा किया जा सकता है। फिर इसके नेता सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी और मौत अभी तक एक रहस्य ही है। ये रहस्य स्वतंत्रता आंदोलन के वैश्विक होने की पुष्टिï करता है। जब तक इन सभी पहलूओं को सामने नहीं रखा जायेगा तो सही तस्वीर सामने नहीं आयेगी।

Monday, August 17, 2009

geet-mehdi hasan

हम चले इस जहां से
दिल उठ गया यहां से
उन्हें दे दो खबर मर चले हम मगर
ले चले याद उनकी जहां से
यूं भी होंगी मुहब्बत की रुसवाईयां
मेरे मरने से गूजेंगी शहनाईयां
रोयेगी मौत भी बेकसी पे मरेगी
जब उठेगा जनाजा यहां से
हम चले इस जहां से
दिल उठ गया यहां से........................
अब जियें तो जियें किस की खातिर जियें
जिंदगी का जहर किस खुशी में पियें
जब बना आशियां, जब खिला गुलसितां
गिर गयी बिजलिया आसमां से
हम चले इस जहां से दिल उठ गया यहां से
जिंदगी का छलकने को अब जाम है
मरते मरते भी लब पे तेरा नाम है
तू सलामत रहे ता कयामत रहे
हम अकेले चले हैं यहां से
हम इस जहां से
उन्हें दे दो खबर मर चले हम मगर
ले चले याद उनकी यहां से

Friday, July 31, 2009

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा

हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या खाद्यान्न के सुरक्षित भंडारण तथा उसके संग्रह करने की है। इस समस्या से अधिकोष के माध्यम से निपटा जा सकता है। अन्न अधिकोष स्थानीय समुदाय को सामुहिक रूप से अन्न संग्रह करने व जरूरत के समय पर उपयोग करने का एक अच्छा मौका प्रदान करता है।
अन्न अधिकोष स्थानीय खाद्य असुरक्षा को हल करने में सहायक होता है विषेशकर फसल विहीन समय और प्राकृतिक आपदा के समय क्षणिक भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए। सदस्य अन्न अधिकोष में अनाज रखते हैं, जिसे वे ब्याज सहित वापस करते हैं। स्थानीय खाद्यान्न कमी की स्थिति में, समुदाय प्रबंधित अन्न अधिकोष केंद्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों की अपेक्षा ज्यादा तेजी से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।
फसल लगाने के समय बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने में अन्न अधिकोष, 'बीज अधिकोष की तरह भी कार्य कर सकते हैं। इससे स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और पोषक तत्वों से भरपूर स्थानीय फसलों जैसे कि मिलेट्स और दलहन की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। मिलेट्स की खेती को पुनर्जीवित करने के लिए डेक्कन डेवलपमेंट सोसाईटी ने आन्ध्रप्रदेश में एक मिलेट कैम्पेन भी चलाया। बीज और अनाज अधिकोष की एकीकृत परिकल्पना किसानों को अगले फसल चक्र में बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करता है और उनके खाद्यान्न की जरूरतों को भी पूरा करता है।
गरीबी से त्रस्त समुदाय जो कि अक्सर महाजनों से उधार लेकर अपने खाद्यान्न की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, उनके लिए अन्न अधिकोष ऋण सेवाएं उपलब्ध कर एक मूल्यवान विकल्प सिद्ध होता है। महाराष्टï्र के सूखाग्रस्त गांवों में, अन्न अधिकोष ने गांवों के समुदाय को देशी उपायों द्वारा, खाद्य सुरक्षा एवं ऋण के मुद्दों को संबोधित करनें मे सक्षम किया है।
अन्न अधिकोष के कार्यकलापों एवं प्रबंधन में महिलाएं केंद्रीय भूमिका निभातें हैं। भूमिहीन दलित महिलाओं के लिए अन्न अधिकोष की एक परियोजना, सांगली नगर निगम की बस्तियों मे जीवन स्तर को बढ़ाने में कामयाब रही है। महिलाएं वर्षभर बीजों को बचाकर अन्न अधिकोष में जमा करती हंै। चूंकि महिलाओं का बाजार जाना कम हो पाता है, अन्न अधिकोष उन्हें कृषि के लिए जरूरी बीज लेने में सहायता देता है।
अन्न अधिकोषों के प्रभावशाली होने के काफी साक्ष्य हैं क्योंकि ये स्थानीय समुदायों के पहल पर ज्यादा निर्भर होते हैं और संस्थागत पहल पर कम। इस तरह के विकेंद्रीकृत एवं समुदाय प्रबंधित अन्न अधिकोषों के प्रभावशाली होने के और भी कारण हैं जैसे माल ढलाई की लागत में कमी, कम नुकसान, स्थानीय अनाज सरंक्षण के तरीके तथा कम खरीद लागत।
अन्न अधिकोषों के लंबे समय तक निरंतरता और स्थिरता के सफलता के मापदंड बहुत सारे हैं लेकिन सबसे मुख्य कारण है समुदाय की भागीदारी और उनका प्रबंधन में सक्रिय भागीदारी होना। स्थानीय पंचायत समिति का मजबूत नेतृत्व और उनका समुदाय के सदस्यों के साथ बेहतर तालमेल भी अति आवश्यक है। समुदाय को भी जरूरत है कि वह अन्न अधिकोष के प्रबंधन से संबंधित ज्ञान और कुशलताओं से परिचित हों। पहुंच में आसानी हो। इसलिए गांव में अन्न अधिकोष का स्थान भी काफी महत्वपूर्ण है विषेशत: उन क्षेत्रों में जहां बाढ़ का प्रकोप होता है।
उचित भंडारण का प्रावधान एक और मुख्य पहलू है, जिसकी ओर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अयोग्य भंडारण के चलते बहुत सारा खाद्यान्न नष्ट हो जाता है। अन्न अधिकोष की सफलता में अनाज की किस्म भी बहुत महत्वपूर्ण कारक हैं क्योंकि लेन-देन में उचित गुणवत्ता की स्थानीय किस्मों की मांग होती है।
स्थायित्व के लिए, अन्न अधिकोष का समुदाय द्वारा स्वामित्व काफी महत्वपूर्ण है। साहेल क्षेत्र में, आईएलओ के एकोपाम प्रोग्राम ने अन्न अधिकोषों की स्थापना स्थापित, नियंत्रण एवं विस्तार के लिए, उचित स्थिति बनाई है। स्थानीय समुदायों की विशेषताएं एवं उनकी जरूरतों तथा क्रियांवयन के समय सभी पात्रों की भागीदारी सुनिश्चित के करने के कारण, इस दृष्टिकोण को काफी महत्व दिया गया है।
अन्न अधिकोष की निरंतरता एवं स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक विकल्प हो सकता है, पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत 'अन्न कोषÓ के प्रावधान का लाभ लेना। इसके साथ ही, ग्राम पंचायत के अगुआई मे स्वयं सहायता समुह भी अन्न अधिकोषों का प्रबंधन कर सकते हैं। 'अग्रगामी ने उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में सामुदायिक अन्न अधिकोषों को स्थापित किया है और उनका मॉडल फसलहीन समय में भुखमरी और कुपोषण से निपटने में कारगर सिद्ध हुआ है। उड़ीसा में स्वयं सहायता समूह द्वारा प्रबंधित अन्न अधिकोषों के सफल उदाहरण मौजूद हैं जो कि नाबार्ड द्वारा समर्थित हैं। छत्तीसगढ़ के बतरा पंचायत के अन्न अधिकोष कार्यक्रम ने कलस्टर दृष्टिकोण अपनाया है। झारखंड और बिहार में खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा योजना ने गांवों के समूह के बीच अन्न अधिकोषों की स्थापना की है जिसमें अन्न अधिकोष निर्माण हेतु व्यवहार में न आने वाले ढांचे का पुनरूद्धार किया गया।
भुखमरी एवं कुपोषण से लडऩे हेतु पारिवारिक खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को मजबूत/सुदृढ़ करने के लिए जरूरत है-समुदाय, पंचायत, गैर सरकारी संस्था, सरकारी विभाग एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्थाओं के बीच एक सहयोगी रूपरेखा बनाई जाए। नरेगा जैसे राष्टï्रीय कार्यक्रम फसल की पैदावार बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं जिससे पंचायत स्तर पर खाद्य भंडार बढ़ सके। पिछड़े क्षेत्रों की अनुदान राशि (बी.आर.जी.एफ. फंड) के तहत, जरूरी संरचना बनाने के लिए आवश्यक राशि जुटाई जा सकती है। अन्न अधिकोषों के सुचारू रूप से संचालन एवं प्रबंधन में कुछ चिंता जताई गई, जिनको अगर पर्याप्त रूप से संचालित किया जाए तो इन हस्तक्षेपों की लंबे समय तक निरंतरता एवं स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती है। बचत एवं ऋण के रूप में अनाज, एक जटिल प्रबंधन व्यवस्था है और कभी-कभी अपर्याप्त क्षमता के कारण स्वयं सहायता समूह या समुदाय इसे सही तरह से संभाल नहीं सकते।
निरंतर सूखे और बाढ़ से फसलों का नुकसान, फसलों की पैदावार में तेजी से गिरावट आदि अन्न अधिकोषों के विफलता का कारण बनते हैं और इसलिए इन इलाकों में सामुदायिक अन्न अधिकोषों की रूप रेखा बनाने के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किस तरह आपातकाल में भंडार की पुन: पूर्ति हो।
समय के साथ अन्न अधिकोषों का विकास एक सफल खाद्य सुरक्षा हस्तक्षेप से लेकर ग्रामीण समुदाय के आर्थिक एवं समाजिक विकास के लिए एक व्यापक स्वयं सहायता व्यवस्था के रूप मे हुआ है।
अन्न अधिकोष की सफलता एवं इसकी स्थिरता व निरंतरता के लिए सामरिक योजना और प्रभावी प्रबंधन जिसमें स्थानीय समुदाय शामिल हो, अति महत्वपूर्ण है।

भारत और इंडिया को करीब लाता बजट


संसद में जब वित्तमंत्री देश का आम बजट पेश कर रहे थे तो उस वक्त यह एहसास सबको हुआ होगा कि एक लोकतांत्रिक देश का बजट ऐसा ही होना चाहिए। शायद ग्रामीण विकास जिस पर देश की आर्थिक एवं राजनैतिक व्यवस्था टिकी हुई है, को बजट में सबसे ज्यादा महत्व दिया गया। बजट इंडिया की बजाय भारत को ध्यान में रखकर बनाया गया तथा इंडिया और भारत का अंतर कम करने की कोशिश की गयी। हालांकि बजट से कॉर्पोरेट जगत ज्यादा खुश नहीं है लेकिन वित्तमंत्री का विचार है कि यदि किसान और ग्रामीण संपन्न होगा तो इससे उद्योग भी चमकेंगे। भले ही शेयर बाजार बेहाल हो रहा हो लेकिन समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग बजट से काफी प्रसन्न हैं। भारत जिसके बारे में कहा जाता है कि वह गांव में निवास करता है और यदि भारत को सुदृढ़ करना है तो गांव को मजबूत करना होगा। यही सोच कर कांग्रेस केंद्र सरकार ने अपने चुनावी वादे के तहत गांव तथा कृषि विकास के लिए बजट के माध्यम से असीम धनराशि की बरसात की है। इसे आप सियासी कलाबाजी कहें या इस आर्थिक मंदी के दौर में भारत की आर्थिक व्यवस्था को सहारा देने की कोशिश। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इन उम्मीदों को कुछ हद तक पूरा भी किया है। देश इस वक्त ऐसे आर्थिक उथल - पुथल का शिकार है , जो पिछले कई दशकों में नहीं देखा गया। आम चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ( यूपीए ) की सरकार बेहतर जनादेश के साथ सत्ता में दोबारा आई। इस राजनीतिक घटनाक्रम ने लोगों की उम्मीदों पर पंख लगा दिए। कुछ भी हो बजट से ग्रामीण विकास एवं कृषि जगत में खुशी की लहर दौड़ गयी। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि बजट में नरेगा जैसे सफल योजना के लिए धनराशि को 144 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि नरेगा के माध्यम से ग्रामीणों के जीवन की कठिनाइयों को सरल किया गया है। नरेगा के लिये 39,100 करोड़ रुपये की धनराशि प्रदान की गयी है। इसके साथ ही राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को 7000 करोड़ रुपये प्रदान किये गये हैं। यह एक वास्तविकता है कि यदि गांव को मजबूत करना है तो वहां विद्युत आपूर्ति को और अधिक मजबूत करना होगा। बजट द्वारा आम आदमी को रोजगार गारंटी योजना में विस्तार और 25 किलो अनाज तीन रुपए प्रति किलो में उपलब्ध होने से राहत मिलेगी। किसानों और छोटे उद्योगों को सस्ता कर्ज मिलने से राहत मिलेगी। छोटी अवधि का तीन लाख रुपये तक का लोन लेेने वाले किसान यदि अपने कर्ज को समय के भीतर वापस कर देते हैं तो उनके लिये ब्याज दर सात फीसदी के बजाय छह फीसदी होगी। सरकार का यह कदम शायद किसानों को समय पर कर्ज वापस करने के लिये प्रोत्साहित करना भी हो सकता है। इसके अलावा किसानों को सीधे कृषि सब्सिडी का प्रस्ताव भी किया गया। कृषि के लिये कर्ज के लक्ष्य को बढ़ाकर 3,25,000 रुपये कर दिया गया है। सिंचाई परियोजनाओं को अतिरिक्त 100 करोड़ रुपये देने की घोषणा भी की। इसके अलावा वित्त मंत्री ने कृषि विकास दर हर साल चार फीसदी बढ़ाने का ऐलान भी किया। बजट में ग्रामीण आवास कोष के लिये 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। अनुसूचित जाति बाहुल्य वाले गांवों के लिये प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना की भी बात कही गयी है तथा इसके साथ राष्टï्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की शुरुआत भी इस साल 100 करोड़ से शुरू करने की बात कही गयी है। ग्रामीणों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए राष्टï्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में 257 करोड़ रुपये का आवंटन बढ़ा दिया गया। हालांकि बजट में कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों को इतनी रकम आवंटन के बाद भी विशेषज्ञ इसे पर्याप्त नहीं मान रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों को कहना है कि कृषि के लिए सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने की योजना से किसानों को विशेष लाभ नहीं होगा। उनकी मुख्य जरूरत कृषि उत्पादों के मूल्यों में बढ़त है। इस दिशा में उन्हें राहत देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।
ऐसा नहीं है कि बजट में दूसरे क्षेत्रों को ध्यान नहीं रखा गया है लेकिन इस बजट की विशेषता सिर्फ यही है कि पूरा बजट एक ग्रामीण भारतीय, आम भारतीय तथा एक भारतीय किसान के नाम कर दिया गया। बजट में दूसरी राहतें भी प्रदान की गयी हैं जैसे सभी करदाताओं के लिए बेसिक छूट एक लाख 50 हजार रुपए से बढ़ाकर एक लाख 60 हजार कर दी गई है और आयकर पर लगने वाले दस प्रतिशत सरचार्ज को हटा दिया गया है। बजट में मंदी के असर को समाप्त करने के लिये वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के लक्ष्य को त्याग दिया गया है। सरकार नोट छापकर बुनियादी संरचना में निवेश करेगी जिससे घरेलू बाज़ार में सीमेंट स्टील और श्रम की मांग बढ़ेगी और मंदी को तोडऩे में मदद मिलेगी।
सरकार का लक्ष्य आम उपभोक्ताओं के हाथों में ज्यादा पैसा देना है। इससे देश में मांग को बल मिलेगा, नतीजतन आर्थिक वृद्धि दर को रफ्तार मिल सकेगी। पिछले पांच साल तक बढ़ते निवेश के चलते आर्थिक वृद्धि दर को तेजी मिलती रही, अब आने वाले कुछ सालों तक आर्थिक तरक्की में मांग बड़ी भूमिका अदा करेगी। बजट और आर्थिक नीतियों को समझने के लिए हमें मामले की तह तक जाना होगा। यह बजट ऐसे समय आया है , जब देश में मांग का स्तर लगभग स्थिर बना हुआ है और ग्रामीण व शहरी इलाकों के आर्थिक हालातों में अंतर बढ़ता चला जा रहा है।
संपादन विभाग





Thursday, July 30, 2009

बात पते की: सरकार की नीयत में खोट

बात पते की: सरकार की नीयत में खोट

सरकार की नीयत में खोट


लंबी मुद्दत तक इंतजार करने के बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले लिब्राहन आयोग ने जैसे ही अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को पेश की देश की राजनीति में एक भूकंप आ गया।। हालांकि यह रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हो पाई है और गृहमंत्री पी चिदंबरम के इस बयान के बाद के इनके अध्ययन करने की चाल सुस्त है अंदाजा लगाया जा सकता है कि अभी इसके सार्वजनिक में होने में काफी समय लग सकता है। लेकिन इस पर राजनेताओं विशेषरूप से भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की तरफ से जिस तरह की बयानबाजी हो रही है इससे राजनीतिक पारा चढ़ रहा है और इस पर जबरदस्त हंगामा होने के आसार नजर आ रहे हैं। सांप्रदायिक शक्तियों की तरफ से रिपोर्ट को दबाने का दबाव डाला जा रहा है। जबकि मुसलमानों और दूसरे राजनीतिक हलकों की तरफ से जिन में वामपंथी पार्टियां भी शामिल हैं इस रिपोर्ट को शीघ्र ही संसद में पेश कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं। सरकार अभी इस पर कुछ नहीं बोल रही है। वह न तो सरकार पर कार्रवाई करने की बात कर रही है और न दोषियों का पक्ष करने की बात कर रही है। ऐसा लगता है कि वह कोई भी निर्णय करने से पूर्व देश के राजनीतिक और सामाजिक हालात का अच्छी तरह जायजा ले रही है ताकि जल्दबाजी में कोई कदम उठाने पर अफसोस न करना पड़े। इस में कोई संदेह नहीं है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच में काफी देर लगी है। जो काम तीन महीनों में होना था उसमें 18वर्ष लग गये। वह भी ऐसे हालात में जब विध्वंस से संबंधित तमाम जानकारियां रिकॉर्ड में थी। विध्वंस की पेशगी रिपोर्ट खूफिया एजेंसी ने एक रिपोर्ट बनाकर सरकार दे रखी थी। विध्वंस की योजना किन लोगों ने बनायी तथा किस प्रकार विध्वंस के लिये एक आंदोलन चलाया गया। कारसेवकों को क्या-क्या प्रशिक्षण दिये गये थे। किस प्रकार रिहर्सल करायी गयी थी। ये तमाम जानकारियां सरकार के पास थी। विध्वंस के दृश्य तथा उस वक्त कारसेवकों की भीड़ को भड़काने वाले भाषण कैमरों में कैद थी। इतना सब होने के बावजूद परिणाम सामने आने में इतना समय लग गया कुछ अर्थ जरूर रखता है। फिर भी संतोष की बात यह है कि देर से ही सही लिब्राहन आयोज ने अपनी जिम्मेदारी किसी तरह निभाकर गेंद सरकार के पाले में डाल दी। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाये। विध्वंस के सभी मुकदमे लखनऊ और रायबरेली की विशेष अदालतों में खास और आम आरोपियों में अंतर करते हुए दो भिन्न-भिन्न एफआईआर के तहत चल रहे हैं, वह 18 वर्षों में चार्जशीट दाखिल करने से आगे नहीं बढ़ सके हैं। यह काफी चिंताजनक बात है। जब वह 18 वर्षों में केवल अपनी प्रारंभिक स्थिति में है तो अनुमान लगाया जा सकता है कि इनके निपटारे तक कितनी अवधि लग सकती है।
दरअसल बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में आजादी से लेकर आज तक किसी भी सरकार की नीयत ठीक नहीं थी। न्याय का दामन किसी ने भी नहीं थामा वरना न तो इसे विवादित करार देकर ताला लगाया जाता और चोरी छिपे इसमें मुर्तियां रखकर पूजा पाठ के लिए खोला जाता और मुसलमानों के लिये दरवाजे हमेशा के लिए बंद नहीं कर दिये जाते। आज भी वहां कानून तौर पर नमाज पढऩे की अनुमति है। लेकिन कोई भी सरकार इसे पक्का करने का साहस नहीं करती। नमाज पढऩे में इसे शांति व्यवस्था को खतरा नजर आता है जबकि पूजा पाठ करने में कोई खतरा नजर नहीं आता। एक बार उच्चतम न्यायालय ने भी इस मामले में केंद्र सरकार की परीक्षा ली थी और पूछा था कि यदि फैसला मस्जिद के पक्ष में आया तो उसे लागू किया जायेगा। इस पर सरकार ने कोई स्पष्टï उत्तर नहीं दिया और न्यायालय ने अपनी बात को वापस ले लिया था। लिब्राहन आयोग ने की जाचं में इतनी देर से कोई भी यह न समझे कि इस काम में इतना वक्त कैसे लग सकता था बल्कि इस का मकसद ये था कि सच्चाई को उस वक्त तक दबा दिया जाये जब तक लोग स्वयं इसे भूल न जायें। अगर सरकार का उद्देश्य सच्चाई को सामने लाना और दोषियों को सजा दिलाना होता तो बहुत पहले ही सजा मिल चुकी होती। हमारे सामने इसका साफ उदाहरण मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों की दो घटनाएं हैं। एक सांप्रदायिक दंगे तो पहले हुए थे और दूसरे बम विस्फोटों के बाद हुए थे। पहले दंगों में सरकार कोई कानूनी कार्रवाई करना नहीं चाहती थी और दोषियों को सजा दिलाना नहीं चाहती थी, इससे बचने के लिए इस ने श्रीकृष्णा आयोग को इसकी जांच दे दी। और जब इस आयोग जांच पूरी कर रिपोर्ट दी तो इसे गड़े मुर्दे उखाडऩे की मिसाल देकर फाइलों को बंद कर दिया। सरकार बम विस्फोटों के दोषियों को सजा दिलाना चाहती थी तो इसकी जांच सीबीआई को सौंप कर फौरन मुकदमा चलवा दिया और अदालत से सजाएं भी दिलवा दीं। आशंका इस बात है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस और लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट के साथ भी इसी तरह का व्यवहार न हो। वैसे भी हमारे देश की परंपरा रन्ही है कि जब सरकार किसी मामले में कानूनी कार्रवाई नहीं करनी होती तो इसके लिये एक जांच आयोग बना दिया जाता है और आयोज द्वारा की गयी सिफारिशों पर कभी अमल नहीं किया जाता।
बाबरी मस्जिद की समस्या जिसने देश के राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों पर गहरा असल डाला इतना जटिल नहीं जितना जटिल बनाकर पेश किया जाता है। इसकी तमाम सच्चाईयां पहले दिन से ही साफ हैं और बहुत सी चीजें तो दस्तावेजों में मौजूद हैं। अयोध्या से जुड़े बहुत से मुकदमे पचास सालों से अदालतों में हैं और बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला कैमरों में है जिसकी जांच लिब्राहन आयोग ने की है और जिसके मुकदमे लखनऊ और रायबरेली की अदालतों में हैं। असल समस्या सरकार की नीयत में खोट का है और राजनीतिक पार्टियों की सकारात्क व नकारात्मक राजनीति का है। यही कारण है कि आधी सदी से यह मामला अटका हुआ है। सरकार केवल मौखिक बयानबाजी कर रही है तथा बिल्कुल भी इन मामलों में गंभीर नहीं है। लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सरकार की आजमाइश तो अपनी जगह होगी मुसलमानों की आजमाइश भी होगी कि वह रिपोर्ट को लागू कराने में कितने कामयाब हो पाते हैं। मुसलमानों को देखना होगा कि अगर वह इस चरण में कामयाब हो गये तो अयोध्या के दूसरे मामलों में भी न्यायालयों के फैसलों को लागू करा पायेंगे। इसके लिये सरकार पर दबाव बनाने के लिये मुसलमानों को एक स्पष्टï नीति बनानी होगी। (साभार: दावत उर्दू)

Friday, July 3, 2009

मुद्दा

ईमानवली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। और अपने शृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है। और अपने सीनों(वक्षस्थलों) पर अपने दुपट्ट डाल रहें और अपना शृंगार किसी पर जाहिर न करें सिवाय अपने पतियों के या अपने बापों के या अपने पतियों के बापों के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या अपने मेल जोल की स्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिल्कियत में हो उनके या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुके हों जिसमें स्त्री की जरूरत होती है, या उन बच्चों के जो स्त्रियों के परदे की बातों से परिचित न हों। और स्त्रियां अपने पांव धरती मारकर न चलें कि अपना जो शृंगार छिपा रखा हो, वह मालूम हो जाये। (कुरआन: सूरह नूर)यह है वह पहला आदेश जो इस्लाम में पर्दे के अनिवार्य करने करते हुए कुरआन में दिया गया है। दरअसल पर्दा इस्लाम में महत्वपूर्ण माना गया है। फ्रंास के राष्टï्रपति सरकोजी द्वारा दिया गया हालिया बयान के बाद हंगामा होना लाजिमी था। फ्रांस में महिलाओं द्वारा बुरका पहनने के अधिकार के लिए बहुत दिनों से मांग की जाती रही है। राष्टï्रपति सरकोजी ने फ्रांस की संसद में यह कहकर कि देश में बुरके के लिए कोई स्थान नहीं पूरे विश्व मुस्लिम समुदाय में भौचाल आ गया है। सरकोजी के बयान पर दारुलउलूम देवबंद ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सरकोजी से बयान वापस लेने की अपील की। राष्टï्रपति सरकोजी का बयान उस समय आया जब दुनिया आंतकवाद जैसे मुद्दे से निपटने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रही है। आतंकवाद जो पूरी दुनिया के लिए ही जी का जंजाल बन चुका है। शायद ही कोई देश ऐसा हो जो किसी न किसी रूप से आतंकवाद से अछूता हो। आतंकवाद जिसकी बुनियादी वजह धार्मिक कट्टïरवार को बताया जाता है। क्या सरकोजी को इस समय यह बयान देना चाहिए था। ऐसे बयानों से एक विशेष समुदाय जिस पर पहले ही कट्टïर होने के आरोप लगते रहते हैं तीव्र प्रतिक्रिया होती है। समझ में ये बात नहीं आती कि पर्दे के खिलाफ जब भी कोई तर्क दिया जाता है उसमें ये बात शामिल होती है कि मुस्लिम औरतें मर्दों मे दबाव में आकर पर्दा करने पर मजबूर होती हैं। ये बात पता नहीं किस आधार पर कही जाती है। वास्तविकता ये है कि कुरआन की ऊपर दी गयी आयतों से स्पष्टï है कि पर्दा करना इस्लाम की तरफ से औरतों को दिये आदेशों में से एक आदेश है। कुरआन ने मर्दों और औरतों को बहुत से आदेश दिये हैं। अब वह मर्दों और औरतों की जिम्मेदारी है कि वह इस्लाम के अनुयायी बनकर इन आदेशों को पालन करें। औरतें भी इस्लाम की अनुयायी हैं इसलिये वह भी इन कुरआनी आदेशों को दिल से मानती हैं तथा पर्दे को आवश्यक कुरआनी आदेश समझकर उसका पालन करती हैं। एक ओर बात ये है पता नहीं दुनिया ने महिलाओं के आजादी की क्या परिभाषाएं बन रखी हैं। जब किसी औरत के साथ बलात्कार किया जाता है तो शायद उतना शोर नहीं मचता लेकिन जब किसी बलात्कारी को सजा दी जाती है तो मानवाधिकार के नाम पर बहुत सी आवाजें उठने लगती हैं। समझ में नहीं आता कि औरतों की आजादी का क्या मतलब इन लोगों के दिमागों में है।

Thursday, June 11, 2009

सोच विचार


संसद चुनाव के बाद कांग्रेस फिर देश की सत्ता पर काबिज हो गयी है। मुसलमान ऐसे खुश हैं जैसे कि उनकी खिलाफत दिल्ली पर कायम हो गयी हो। ये वही कांगे्रस है जिसकी पिछली चालीस साल की हकुमत में इतने सांप्रदायिक दंगे हुए और बेशुमार मुसलमान इन दंगों का शिकार हो गये। क्या कांग्रेस के आने से यह खतरे फिर नहीं बढ़ गये कि देश में कहीं फिर सांप्रदायिक दंगों की बाढ़ न चल पड़े। यह बात कांग्रेस के भावी राजकुमार राहुल को सोचनी पड़ेगी कि जिन मुसलमानों की वजह से वह उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने में कामयाब हो गयी उन्हें वह क्या दे पायेंगे। कांग्रेस इस खुशफहमी में न रहे कि मुसलमानों ने अगर इस बार वोट कांगे्रस को दे दिया तो वह आइंदा भी इसी तरह वोट देते रहेंगे। इसका कारण यह बना कि सपा से खिसका मुसलमान वोट सीधा कांग्रेस की तरफ मुड़ गया जिसकी वजह से कांग्रेस को अच्छी खासी कामयाबी मिली। हालांकि कांग्रेस के कुछ हलकों की तरफ से यह बात भी उड़ायी गयी कि इस जीत में राहुल ने कोई जादू किया है यह बात सिर्फ हकीकत से मुंह मोडऩे जैसा है। यह वर्ग वह है जो आरएसएस से किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है। इस वर्ग का मानना है कि कहीं कांग्रेस सच्चर रिपोर्ट के आधार पर मुसलमानों के लिये कल्याणकारी योजनाएं न चला दे।

Friday, March 13, 2009

संसद चुनाव


पूरे देश में पार्लियामेंट चुनावों का ऐलान हो गया है। फिर वही नारे, वही वादे, वही कसमें नेताओं की तरफ़ से खाई जा रही हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच मुकाबला होता नजऱ आ रहा है। जब से कल्याण सिंह समाजवादी पार्टी में शामिल हुए हैं मुसलमान खुद ही सपा के खिलाफ बोलने लगे हैं। इसकी वजह से सपा के बड़े मुस्लिम लीडर सपा छोड़ कर बसपा में शामिल हुए हैं। प्रदेश में पूरब इलाके में मुस्लिम वोट सपा से खिसक कर बसपा की बजाए कांग्रेस की तरफ जा रहा है। इससे कांग्रेस को काफी फायदा होता नजर आ रहा है। वेस्ट में मुसलमान अगर सपा के खिलाफ हुए भी हैं तो वह कांग्रेस को नहीं बल्कि बसपा को पसंद कर रहे हैं। इसकी वजह भी है की वेस्ट के कद्दावर मुस्लिम नेता बसपा में हैं। भाजपा की हालत इस चुनाव में क्या होगी कोई कुछ नहीं कह सकता। शायद भाजपा अपने वजूद को बचाने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेता राजनाथ सिंह गाजियाबाद में घिरते नजर आ रहे हैं। बसपा की इस चुनाव में बहुत फायदा होने वाला है जबकि दूसरी पार्टियां कुछ न कुछ नुकसान उठा रही हैं। कांग्रेस अगर कुछ ले पाये तो वह मुस्लिमों की सपा से नाराजगी का फायदा उठा सकती है। अबकी बार कुछ मुस्लिम लोगों ने अपनी पार्टी बना कर मैदान में उतरने का भी फैसला किया है लेकिन उन्हें कोई खास कामयाबी की उम्मीद नहीं है।

Saturday, January 10, 2009

ज़रूरी बात


आज के दौर में पूरा विश्व नरसंहार देख रहा है। विश्व शक्तियां अपने भय को कायम रखने के लिये छोटी ताकतों को अपना शिकार बना रही हैं। इस कत्लेआम का शिकार सबसे ज्यादा मुसलमान हो रहे हैं। देखने में तो हर लड़ाई के लिए मुसलमानों को ही जिम्मेदार बताया जाता है लेकिन हकीकत कुछ और ही है। दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति तथा पश्चिम सभ्यता को नेतृत्व कर रहे अमेरिका के एक जिम्मेदार नेता का कहना है की सोवियत यूनियन के टूटने के बाद हमारा दुश्मन केवल और केवल इस्लाम है। अमेरिका और उसके साथी जो दुनिया में पूंजीवाद को बढ़ाना चाहते हैं उनको ये लगने लगा है की इस्लाम ही उनके मकसद में सबसे बड़ा रोड़ा है। अपने मंसूबो को पूरा करने के लिए ये शक्तियां एक एक करके मुस्लिम मुल्कों को शिकार बना रही हैं। जो मुस्लिम मुल्क भी मजबूत होता है उसे ही बरबाद करने के लिए अमेरिका और उसके पिछलग्गू खड़े हो जाते हैं। इराक, अफगानिस्तान के बाद अब इरान पर नजरें जम रही हैं और साथ ही पाकिस्तान भी निशाने पर आने लगा है। मुस्लिम मुल्कों की इस हालत को देख कर अफसोस होता है। सवाल ये है की मुसलमानों की इस हालत के लिए क्या केवल गैर मुस्लिम ही जिम्मेदार हैं। नहीं, बल्कि खुद मुसलमान जिम्मेदार हैं। मुसलमानों में (कपटाचारियों) मुनाफिकों की कमी नही है। मुनाफिक इस मायने में की जब इस्लाम को किसी भी देश के संविधान के रूप में लागू करने की बात की जाती है तो वह इसके खिलाफ हो जाते हैं। वह इस्लाम को रोजे और नमाज़ तक सीमित कर देना चाहते हैं लेकिन जब इस्लाम की किसी व्यवस्था की बात की जाती है तो उन पर मुसीबत के पहाड़ टूटने लगते हैं। वह शैतान के अनुयायी बन जाते हैं। वह ऐसी किसी भी कोशिश के विरुद्ध हो जाते हैं जो इस्लाम को विधान के तौर पर लागू करने के लिए की जाती है। ऐसे लोगों की तादाद मुसलमानों में कम नही हैं बल्कि बहुत बड़ी संख्या में ये लोग मौजूद हैं। इन लोगों ने इस्लाम को सही मायनों में समझा ही नहीं। वह इस्लाम को दूसरे धर्मों की तरह ही एक धर्म समझते हैं। उन्हें नहीं पता की इस्लाम एक जिंदगी गुजारने का तरीका है। अभी दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही है। इसकी वजह सिर्फ ब्याज आधारित कारोबार है। अगर इस्लाम के मानने वाले अपनी इस जकात व्यवस्था को दुनिया के सामने लायें तो विश्व को ऐसी परेशानियों से निजात मिल सकती है। लेकिन हमारे पढ़े लिखे लोग खुद इस्लाम की किसी व्यवस्था को जानते तक नहीं। वक्त आ गया है की मुसलमान इस्लाम को व्यवस्था के रूप में लेकर उस पर अमल करें और दूसरों की भी इस्लाम की जानकारी दें। कुरान का अध्ययन करें और हर ऐसी कोशिश का समर्थन करें जो कुरआनी व्यवस्था जो न्याय आधारित व्यवस्था है उसे लागू करने के लिये की जा रही हो।