Friday, July 3, 2009

मुद्दा

ईमानवली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। और अपने शृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है। और अपने सीनों(वक्षस्थलों) पर अपने दुपट्ट डाल रहें और अपना शृंगार किसी पर जाहिर न करें सिवाय अपने पतियों के या अपने बापों के या अपने पतियों के बापों के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या अपने मेल जोल की स्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिल्कियत में हो उनके या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुके हों जिसमें स्त्री की जरूरत होती है, या उन बच्चों के जो स्त्रियों के परदे की बातों से परिचित न हों। और स्त्रियां अपने पांव धरती मारकर न चलें कि अपना जो शृंगार छिपा रखा हो, वह मालूम हो जाये। (कुरआन: सूरह नूर)यह है वह पहला आदेश जो इस्लाम में पर्दे के अनिवार्य करने करते हुए कुरआन में दिया गया है। दरअसल पर्दा इस्लाम में महत्वपूर्ण माना गया है। फ्रंास के राष्टï्रपति सरकोजी द्वारा दिया गया हालिया बयान के बाद हंगामा होना लाजिमी था। फ्रांस में महिलाओं द्वारा बुरका पहनने के अधिकार के लिए बहुत दिनों से मांग की जाती रही है। राष्टï्रपति सरकोजी ने फ्रांस की संसद में यह कहकर कि देश में बुरके के लिए कोई स्थान नहीं पूरे विश्व मुस्लिम समुदाय में भौचाल आ गया है। सरकोजी के बयान पर दारुलउलूम देवबंद ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सरकोजी से बयान वापस लेने की अपील की। राष्टï्रपति सरकोजी का बयान उस समय आया जब दुनिया आंतकवाद जैसे मुद्दे से निपटने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रही है। आतंकवाद जो पूरी दुनिया के लिए ही जी का जंजाल बन चुका है। शायद ही कोई देश ऐसा हो जो किसी न किसी रूप से आतंकवाद से अछूता हो। आतंकवाद जिसकी बुनियादी वजह धार्मिक कट्टïरवार को बताया जाता है। क्या सरकोजी को इस समय यह बयान देना चाहिए था। ऐसे बयानों से एक विशेष समुदाय जिस पर पहले ही कट्टïर होने के आरोप लगते रहते हैं तीव्र प्रतिक्रिया होती है। समझ में ये बात नहीं आती कि पर्दे के खिलाफ जब भी कोई तर्क दिया जाता है उसमें ये बात शामिल होती है कि मुस्लिम औरतें मर्दों मे दबाव में आकर पर्दा करने पर मजबूर होती हैं। ये बात पता नहीं किस आधार पर कही जाती है। वास्तविकता ये है कि कुरआन की ऊपर दी गयी आयतों से स्पष्टï है कि पर्दा करना इस्लाम की तरफ से औरतों को दिये आदेशों में से एक आदेश है। कुरआन ने मर्दों और औरतों को बहुत से आदेश दिये हैं। अब वह मर्दों और औरतों की जिम्मेदारी है कि वह इस्लाम के अनुयायी बनकर इन आदेशों को पालन करें। औरतें भी इस्लाम की अनुयायी हैं इसलिये वह भी इन कुरआनी आदेशों को दिल से मानती हैं तथा पर्दे को आवश्यक कुरआनी आदेश समझकर उसका पालन करती हैं। एक ओर बात ये है पता नहीं दुनिया ने महिलाओं के आजादी की क्या परिभाषाएं बन रखी हैं। जब किसी औरत के साथ बलात्कार किया जाता है तो शायद उतना शोर नहीं मचता लेकिन जब किसी बलात्कारी को सजा दी जाती है तो मानवाधिकार के नाम पर बहुत सी आवाजें उठने लगती हैं। समझ में नहीं आता कि औरतों की आजादी का क्या मतलब इन लोगों के दिमागों में है।

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