भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न पहलू हैं। जब तक इन तमाम पहलुओं को सामने नहीं रखा जायेगा पूरी तस्वीर नहीं बन सकती। इसका एक पहलू यह भी है कि ये केवल भारत की घटना थी। इसके संबंध अनगिनत बातें कही जा सकती हैं। केवल इसे एक देश की एक घटना नहीं कहा जा सकता। इसका सीधा संबंध वर्तमान में भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन से है। लेकिन इसका विस्तृत अध्ययन किया जाये तो यह एक वैश्विक मामला है। चूंकि इसका संबंध बांग्लादेश से भी है और अफगानिस्तान से भी। नेपाल से भी कहीं न कहीं इसका संबंध निकल आता है। इस पूरे मामले से पूर्व की एक साम्राज्यवादी विश्व शक्ति बड़ी गहराई से जुड़ी हुई थी इसलिये भी इसकी कडिय़ां दूर-दूर जाकर मिलती हैं। दक्षिणी अफ्रीका का भी इस आंदोलन से रिश्ता निकल आता है।
इस आंदोलन की अवधि बहुत लंबी रही है। क्योंकि देश को आजाद कराने की कोशिशें तो अंग्रेजों के भारत पर वर्चस्व स्थापित हो जाने पर ही शुरू हो चुकी थीं, बंगाल पर ईस्ट इंडिया कंपनी के छा जाने के साथ ही विदेशी कब्जे से आजाद होने की इच्छा देशप्रेमियों के दिलो दिमाग में करवट लेने लगी थी। इसलिये 1857 की लड़ाई को भी स्वतंत्रता की लड़ाई कहा जाता है। टीपू सुल्तान के संघर्ष को भी इसी हिस्सा कहा जाता है। याद रहे कि टीपू सुल्तान ने फ्रांस को मदद के लिये पुकारा था इसलिये इसमें इसकी दिलचस्पी भी पैदा हो गयी थी मगर कुछ कारणों से फ्रांस ने इस बात को स्वीकार नहीं किया था। लेकिन टीपू के फ्रांस से संबंध बने रहे। एक तरफ अंग्रेज बहादुर अपने पंजे मजबूती से गाडऩे की कोशिश कर रहा था दूसरी तरफ इससे छुटकारा हासिल करने के स्थानीय प्रयास भी हो रहे थे। इस दौरान प्रथम विश्व युद्ध की घटना हो जाती है जिसके सिलसिले में अंग्रेजों को यह शंका थी कि इसमें भारतीय इसका साथ देंगे या नहीं, लेकिन इतिहास यह बताता है कि भारतीयों ने अंग्रेजी साम्राज्यवादियों का भरपूर साथ दिया। इसका प्रमाण यह भी है कि यूरोप, अफ्रीका और मध्य पश्चिम के विभिन्न मोर्चों पर 13 लाख भारतीय सैनिकों और मजदूरों ने अंग्रेजों के हितों की रक्षा की। इसके दुश्मनों से लोहा लिया। यही नहीं बल्कि यहां के बड़े छोटे हिंदू व मुसलमान जागीरदारों, नवाबों और राजा महाराजों ने दिल खोलकर अंग्रेजों की धन से, अनाज से और गोलाबारूद तथा दूसरे सैन्य सामान से सहायता की। अर्थ यह कि इस अवसर पर भारतीयों ने अंग्रेजों से पूरी निष्ठा का परिचय दिया। ये इस आंदोलन का एक वैश्विक पहलू है। अंग्रेज बहादुर को जो हानि पहुंची इसमें भी भारतीय बराबर के शरीक थे।
ये स्वतंत्रता आंदोलन विदेशी ताकतों से आजादी हासिल करने के लिये था इसलिये इसमें एक स्तर पर दो भूमिकाएं नजर आती हैं, यानी अंग्रेज और भारतीय लेकिन दूसरे स्तर पर भारतीयों के अनगिनत समूह हैं और दूसरे विदेशी तत्वों में अंग्रेजों के अलावा दूसरी शक्तियां जिनमें अमेरिका, जर्मनी उल्लेखनीय हैं। टर्की भी किसी न किसी स्तर पर नजर आता है। वह सीधा इसमें शामिल नहीं बल्कि कहीं न कहीं शामिल जरूर था। स्पष्टï है कि इन सब शक्तियों के हित भी इसमें शामिल हो जाते हैं।
गांधी जी जब अफ्रीका से भारत आये तो अफ्रीका में जो आंदोलन चल रहा था उसका संबंध भी यहां के आंदोलन से हो गया। इस कारण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक पहलू यह भी है और इसे अलग करके नहीं देखना चाहिए। यह मामला अब भारत का नहीं बल्कि पूरे विश्व का हो जाता है। इस कारण जब भारत विभाजन, स्वतंत्रता व मुहम्मद अली जिन्ना की बात की जाती है तो इसमें विदेशी दिलचस्पी पैदा होना स्वाभाविक है और इनकी भूमिका की चर्चा भी जरूरी है। इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता इसलिये ये भी देखना चाहिए कि आजादी के इस आंदोलन में भारतीयों के बलिदान अपनी जगह, स्वयं पूर्व साम्राज्यवादी शक्ति की मर्जी उसकी नीतियों और वैश्विक परिस्थितियों को कितना दखल है। इसलिये अंग्रेज किसी भी कीमत पर भारत छोडऩे को तैयार नहीं थे। इसलिये कि इन के लिये सोने की चिडिय़ा थी। लेकिन प्रकृति के अपने मंसूबे थे। इस दौरान दो विश्व युद्ध हो गये जिससे इस विश्व शक्ति का घमंड टूट गया। अंग्रेजी साम्राज्य का सूरज जब ढलने लगा और इसकी ताकत कमजोर पडऩे लगी तो इसके लिये कब्जाये हुए क्षेत्र बोझ बन गये। इनके प्रबंध में भी मुश्किल आने लगी इसके कारण स्वयं अंग्रेजी समाज भी विभिन्न खराबियों से दोचार हो गया। बल्कि यूं कहें कि अब तबाही उनके करीब आने लगी। विशेषरूप से सामाजिक समस्याएं पैदा होने लगी साथ ही राजनीतिक हलचल भी हुई। जब ब्रिटेन में 1945 के आम चुनाव हुए और लेबर पार्टी की सरकार बनी जिसकी कमान क्लिमेंट रिचर्ड इटली ने संभाली तो इसने नई बस्तियों के संबंध में एक योजना बनायी जिसे डिकोलोनाइजेशन की नीति कहा जाता है। यानी ब्रिटेन ने नई बस्तियों को आजादी का परवाना दिया। इसने भारत के बारे में यह फैसला किया कि इसे आजाद करना है और खास इसी उद्देश्य के लिये लार्ड माउंट बेटन को विशेष प्राधिकार देकर भारत का वॉयसराय नियुक्त किया था। वह इसी विशेष मिशन पर यहां भेजे गये थे कि वह भारत जाकर वहां के नेताओं से इस बारे में बातचीत करें। इस दृष्टिïकोण से देखा जाये तो स्वतंत्रता और विभाजन के सिलसिले में सभी अहम फैसले इसी के नजर आते हैं। इसको भी मद्देनजर रखने की जरूरत है। स्वतंत्रता आंदोलन का एक मुख्य बिंदु आजाद हिंद फौज भी है। ये फौज जिस तरह गठित की गयी और इसके विदेशी संपर्कों का बखुबी अंदाजा किया जा सकता है। फिर इसके नेता सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी और मौत अभी तक एक रहस्य ही है। ये रहस्य स्वतंत्रता आंदोलन के वैश्विक होने की पुष्टिï करता है। जब तक इन सभी पहलूओं को सामने नहीं रखा जायेगा तो सही तस्वीर सामने नहीं आयेगी।