Thursday, July 30, 2009

सरकार की नीयत में खोट


लंबी मुद्दत तक इंतजार करने के बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले लिब्राहन आयोग ने जैसे ही अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को पेश की देश की राजनीति में एक भूकंप आ गया।। हालांकि यह रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हो पाई है और गृहमंत्री पी चिदंबरम के इस बयान के बाद के इनके अध्ययन करने की चाल सुस्त है अंदाजा लगाया जा सकता है कि अभी इसके सार्वजनिक में होने में काफी समय लग सकता है। लेकिन इस पर राजनेताओं विशेषरूप से भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की तरफ से जिस तरह की बयानबाजी हो रही है इससे राजनीतिक पारा चढ़ रहा है और इस पर जबरदस्त हंगामा होने के आसार नजर आ रहे हैं। सांप्रदायिक शक्तियों की तरफ से रिपोर्ट को दबाने का दबाव डाला जा रहा है। जबकि मुसलमानों और दूसरे राजनीतिक हलकों की तरफ से जिन में वामपंथी पार्टियां भी शामिल हैं इस रिपोर्ट को शीघ्र ही संसद में पेश कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं। सरकार अभी इस पर कुछ नहीं बोल रही है। वह न तो सरकार पर कार्रवाई करने की बात कर रही है और न दोषियों का पक्ष करने की बात कर रही है। ऐसा लगता है कि वह कोई भी निर्णय करने से पूर्व देश के राजनीतिक और सामाजिक हालात का अच्छी तरह जायजा ले रही है ताकि जल्दबाजी में कोई कदम उठाने पर अफसोस न करना पड़े। इस में कोई संदेह नहीं है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच में काफी देर लगी है। जो काम तीन महीनों में होना था उसमें 18वर्ष लग गये। वह भी ऐसे हालात में जब विध्वंस से संबंधित तमाम जानकारियां रिकॉर्ड में थी। विध्वंस की पेशगी रिपोर्ट खूफिया एजेंसी ने एक रिपोर्ट बनाकर सरकार दे रखी थी। विध्वंस की योजना किन लोगों ने बनायी तथा किस प्रकार विध्वंस के लिये एक आंदोलन चलाया गया। कारसेवकों को क्या-क्या प्रशिक्षण दिये गये थे। किस प्रकार रिहर्सल करायी गयी थी। ये तमाम जानकारियां सरकार के पास थी। विध्वंस के दृश्य तथा उस वक्त कारसेवकों की भीड़ को भड़काने वाले भाषण कैमरों में कैद थी। इतना सब होने के बावजूद परिणाम सामने आने में इतना समय लग गया कुछ अर्थ जरूर रखता है। फिर भी संतोष की बात यह है कि देर से ही सही लिब्राहन आयोज ने अपनी जिम्मेदारी किसी तरह निभाकर गेंद सरकार के पाले में डाल दी। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाये। विध्वंस के सभी मुकदमे लखनऊ और रायबरेली की विशेष अदालतों में खास और आम आरोपियों में अंतर करते हुए दो भिन्न-भिन्न एफआईआर के तहत चल रहे हैं, वह 18 वर्षों में चार्जशीट दाखिल करने से आगे नहीं बढ़ सके हैं। यह काफी चिंताजनक बात है। जब वह 18 वर्षों में केवल अपनी प्रारंभिक स्थिति में है तो अनुमान लगाया जा सकता है कि इनके निपटारे तक कितनी अवधि लग सकती है।
दरअसल बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में आजादी से लेकर आज तक किसी भी सरकार की नीयत ठीक नहीं थी। न्याय का दामन किसी ने भी नहीं थामा वरना न तो इसे विवादित करार देकर ताला लगाया जाता और चोरी छिपे इसमें मुर्तियां रखकर पूजा पाठ के लिए खोला जाता और मुसलमानों के लिये दरवाजे हमेशा के लिए बंद नहीं कर दिये जाते। आज भी वहां कानून तौर पर नमाज पढऩे की अनुमति है। लेकिन कोई भी सरकार इसे पक्का करने का साहस नहीं करती। नमाज पढऩे में इसे शांति व्यवस्था को खतरा नजर आता है जबकि पूजा पाठ करने में कोई खतरा नजर नहीं आता। एक बार उच्चतम न्यायालय ने भी इस मामले में केंद्र सरकार की परीक्षा ली थी और पूछा था कि यदि फैसला मस्जिद के पक्ष में आया तो उसे लागू किया जायेगा। इस पर सरकार ने कोई स्पष्टï उत्तर नहीं दिया और न्यायालय ने अपनी बात को वापस ले लिया था। लिब्राहन आयोग ने की जाचं में इतनी देर से कोई भी यह न समझे कि इस काम में इतना वक्त कैसे लग सकता था बल्कि इस का मकसद ये था कि सच्चाई को उस वक्त तक दबा दिया जाये जब तक लोग स्वयं इसे भूल न जायें। अगर सरकार का उद्देश्य सच्चाई को सामने लाना और दोषियों को सजा दिलाना होता तो बहुत पहले ही सजा मिल चुकी होती। हमारे सामने इसका साफ उदाहरण मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों की दो घटनाएं हैं। एक सांप्रदायिक दंगे तो पहले हुए थे और दूसरे बम विस्फोटों के बाद हुए थे। पहले दंगों में सरकार कोई कानूनी कार्रवाई करना नहीं चाहती थी और दोषियों को सजा दिलाना नहीं चाहती थी, इससे बचने के लिए इस ने श्रीकृष्णा आयोग को इसकी जांच दे दी। और जब इस आयोग जांच पूरी कर रिपोर्ट दी तो इसे गड़े मुर्दे उखाडऩे की मिसाल देकर फाइलों को बंद कर दिया। सरकार बम विस्फोटों के दोषियों को सजा दिलाना चाहती थी तो इसकी जांच सीबीआई को सौंप कर फौरन मुकदमा चलवा दिया और अदालत से सजाएं भी दिलवा दीं। आशंका इस बात है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस और लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट के साथ भी इसी तरह का व्यवहार न हो। वैसे भी हमारे देश की परंपरा रन्ही है कि जब सरकार किसी मामले में कानूनी कार्रवाई नहीं करनी होती तो इसके लिये एक जांच आयोग बना दिया जाता है और आयोज द्वारा की गयी सिफारिशों पर कभी अमल नहीं किया जाता।
बाबरी मस्जिद की समस्या जिसने देश के राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों पर गहरा असल डाला इतना जटिल नहीं जितना जटिल बनाकर पेश किया जाता है। इसकी तमाम सच्चाईयां पहले दिन से ही साफ हैं और बहुत सी चीजें तो दस्तावेजों में मौजूद हैं। अयोध्या से जुड़े बहुत से मुकदमे पचास सालों से अदालतों में हैं और बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला कैमरों में है जिसकी जांच लिब्राहन आयोग ने की है और जिसके मुकदमे लखनऊ और रायबरेली की अदालतों में हैं। असल समस्या सरकार की नीयत में खोट का है और राजनीतिक पार्टियों की सकारात्क व नकारात्मक राजनीति का है। यही कारण है कि आधी सदी से यह मामला अटका हुआ है। सरकार केवल मौखिक बयानबाजी कर रही है तथा बिल्कुल भी इन मामलों में गंभीर नहीं है। लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सरकार की आजमाइश तो अपनी जगह होगी मुसलमानों की आजमाइश भी होगी कि वह रिपोर्ट को लागू कराने में कितने कामयाब हो पाते हैं। मुसलमानों को देखना होगा कि अगर वह इस चरण में कामयाब हो गये तो अयोध्या के दूसरे मामलों में भी न्यायालयों के फैसलों को लागू करा पायेंगे। इसके लिये सरकार पर दबाव बनाने के लिये मुसलमानों को एक स्पष्टï नीति बनानी होगी। (साभार: दावत उर्दू)

2 comments:

shama said...

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kailashpur said...

शमा जी
आदाब
आपके संस्मरण पढ़ता रहता हूं बहुत अच्छा लिख रही हैं। आपका पूरा परिचय जानना चाहता हूं अगर संभव हो तो यह एहसान कर दीजियेगा।
माजिद