Friday, July 31, 2009

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा

हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या खाद्यान्न के सुरक्षित भंडारण तथा उसके संग्रह करने की है। इस समस्या से अधिकोष के माध्यम से निपटा जा सकता है। अन्न अधिकोष स्थानीय समुदाय को सामुहिक रूप से अन्न संग्रह करने व जरूरत के समय पर उपयोग करने का एक अच्छा मौका प्रदान करता है।
अन्न अधिकोष स्थानीय खाद्य असुरक्षा को हल करने में सहायक होता है विषेशकर फसल विहीन समय और प्राकृतिक आपदा के समय क्षणिक भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए। सदस्य अन्न अधिकोष में अनाज रखते हैं, जिसे वे ब्याज सहित वापस करते हैं। स्थानीय खाद्यान्न कमी की स्थिति में, समुदाय प्रबंधित अन्न अधिकोष केंद्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों की अपेक्षा ज्यादा तेजी से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।
फसल लगाने के समय बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने में अन्न अधिकोष, 'बीज अधिकोष की तरह भी कार्य कर सकते हैं। इससे स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और पोषक तत्वों से भरपूर स्थानीय फसलों जैसे कि मिलेट्स और दलहन की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। मिलेट्स की खेती को पुनर्जीवित करने के लिए डेक्कन डेवलपमेंट सोसाईटी ने आन्ध्रप्रदेश में एक मिलेट कैम्पेन भी चलाया। बीज और अनाज अधिकोष की एकीकृत परिकल्पना किसानों को अगले फसल चक्र में बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करता है और उनके खाद्यान्न की जरूरतों को भी पूरा करता है।
गरीबी से त्रस्त समुदाय जो कि अक्सर महाजनों से उधार लेकर अपने खाद्यान्न की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, उनके लिए अन्न अधिकोष ऋण सेवाएं उपलब्ध कर एक मूल्यवान विकल्प सिद्ध होता है। महाराष्टï्र के सूखाग्रस्त गांवों में, अन्न अधिकोष ने गांवों के समुदाय को देशी उपायों द्वारा, खाद्य सुरक्षा एवं ऋण के मुद्दों को संबोधित करनें मे सक्षम किया है।
अन्न अधिकोष के कार्यकलापों एवं प्रबंधन में महिलाएं केंद्रीय भूमिका निभातें हैं। भूमिहीन दलित महिलाओं के लिए अन्न अधिकोष की एक परियोजना, सांगली नगर निगम की बस्तियों मे जीवन स्तर को बढ़ाने में कामयाब रही है। महिलाएं वर्षभर बीजों को बचाकर अन्न अधिकोष में जमा करती हंै। चूंकि महिलाओं का बाजार जाना कम हो पाता है, अन्न अधिकोष उन्हें कृषि के लिए जरूरी बीज लेने में सहायता देता है।
अन्न अधिकोषों के प्रभावशाली होने के काफी साक्ष्य हैं क्योंकि ये स्थानीय समुदायों के पहल पर ज्यादा निर्भर होते हैं और संस्थागत पहल पर कम। इस तरह के विकेंद्रीकृत एवं समुदाय प्रबंधित अन्न अधिकोषों के प्रभावशाली होने के और भी कारण हैं जैसे माल ढलाई की लागत में कमी, कम नुकसान, स्थानीय अनाज सरंक्षण के तरीके तथा कम खरीद लागत।
अन्न अधिकोषों के लंबे समय तक निरंतरता और स्थिरता के सफलता के मापदंड बहुत सारे हैं लेकिन सबसे मुख्य कारण है समुदाय की भागीदारी और उनका प्रबंधन में सक्रिय भागीदारी होना। स्थानीय पंचायत समिति का मजबूत नेतृत्व और उनका समुदाय के सदस्यों के साथ बेहतर तालमेल भी अति आवश्यक है। समुदाय को भी जरूरत है कि वह अन्न अधिकोष के प्रबंधन से संबंधित ज्ञान और कुशलताओं से परिचित हों। पहुंच में आसानी हो। इसलिए गांव में अन्न अधिकोष का स्थान भी काफी महत्वपूर्ण है विषेशत: उन क्षेत्रों में जहां बाढ़ का प्रकोप होता है।
उचित भंडारण का प्रावधान एक और मुख्य पहलू है, जिसकी ओर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अयोग्य भंडारण के चलते बहुत सारा खाद्यान्न नष्ट हो जाता है। अन्न अधिकोष की सफलता में अनाज की किस्म भी बहुत महत्वपूर्ण कारक हैं क्योंकि लेन-देन में उचित गुणवत्ता की स्थानीय किस्मों की मांग होती है।
स्थायित्व के लिए, अन्न अधिकोष का समुदाय द्वारा स्वामित्व काफी महत्वपूर्ण है। साहेल क्षेत्र में, आईएलओ के एकोपाम प्रोग्राम ने अन्न अधिकोषों की स्थापना स्थापित, नियंत्रण एवं विस्तार के लिए, उचित स्थिति बनाई है। स्थानीय समुदायों की विशेषताएं एवं उनकी जरूरतों तथा क्रियांवयन के समय सभी पात्रों की भागीदारी सुनिश्चित के करने के कारण, इस दृष्टिकोण को काफी महत्व दिया गया है।
अन्न अधिकोष की निरंतरता एवं स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक विकल्प हो सकता है, पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत 'अन्न कोषÓ के प्रावधान का लाभ लेना। इसके साथ ही, ग्राम पंचायत के अगुआई मे स्वयं सहायता समुह भी अन्न अधिकोषों का प्रबंधन कर सकते हैं। 'अग्रगामी ने उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में सामुदायिक अन्न अधिकोषों को स्थापित किया है और उनका मॉडल फसलहीन समय में भुखमरी और कुपोषण से निपटने में कारगर सिद्ध हुआ है। उड़ीसा में स्वयं सहायता समूह द्वारा प्रबंधित अन्न अधिकोषों के सफल उदाहरण मौजूद हैं जो कि नाबार्ड द्वारा समर्थित हैं। छत्तीसगढ़ के बतरा पंचायत के अन्न अधिकोष कार्यक्रम ने कलस्टर दृष्टिकोण अपनाया है। झारखंड और बिहार में खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा योजना ने गांवों के समूह के बीच अन्न अधिकोषों की स्थापना की है जिसमें अन्न अधिकोष निर्माण हेतु व्यवहार में न आने वाले ढांचे का पुनरूद्धार किया गया।
भुखमरी एवं कुपोषण से लडऩे हेतु पारिवारिक खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को मजबूत/सुदृढ़ करने के लिए जरूरत है-समुदाय, पंचायत, गैर सरकारी संस्था, सरकारी विभाग एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्थाओं के बीच एक सहयोगी रूपरेखा बनाई जाए। नरेगा जैसे राष्टï्रीय कार्यक्रम फसल की पैदावार बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं जिससे पंचायत स्तर पर खाद्य भंडार बढ़ सके। पिछड़े क्षेत्रों की अनुदान राशि (बी.आर.जी.एफ. फंड) के तहत, जरूरी संरचना बनाने के लिए आवश्यक राशि जुटाई जा सकती है। अन्न अधिकोषों के सुचारू रूप से संचालन एवं प्रबंधन में कुछ चिंता जताई गई, जिनको अगर पर्याप्त रूप से संचालित किया जाए तो इन हस्तक्षेपों की लंबे समय तक निरंतरता एवं स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती है। बचत एवं ऋण के रूप में अनाज, एक जटिल प्रबंधन व्यवस्था है और कभी-कभी अपर्याप्त क्षमता के कारण स्वयं सहायता समूह या समुदाय इसे सही तरह से संभाल नहीं सकते।
निरंतर सूखे और बाढ़ से फसलों का नुकसान, फसलों की पैदावार में तेजी से गिरावट आदि अन्न अधिकोषों के विफलता का कारण बनते हैं और इसलिए इन इलाकों में सामुदायिक अन्न अधिकोषों की रूप रेखा बनाने के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किस तरह आपातकाल में भंडार की पुन: पूर्ति हो।
समय के साथ अन्न अधिकोषों का विकास एक सफल खाद्य सुरक्षा हस्तक्षेप से लेकर ग्रामीण समुदाय के आर्थिक एवं समाजिक विकास के लिए एक व्यापक स्वयं सहायता व्यवस्था के रूप मे हुआ है।
अन्न अधिकोष की सफलता एवं इसकी स्थिरता व निरंतरता के लिए सामरिक योजना और प्रभावी प्रबंधन जिसमें स्थानीय समुदाय शामिल हो, अति महत्वपूर्ण है।

1 comment:

Mohammed Umar Kairanvi said...

खाद्यान्न के सुरक्षित भंडारण विषय पर आपने अच्छा लिखा, यह लेख ब्लागजगत में भी काफी पसंद किया जायेगा, लिखते रहिये ब्लागजगत को आप जैसों की बहुत आवश्‍यकता है,
आपने मेरा कौनसा ब्लाग देखा, मेरे बहुत से ब्लाग हैं जो मुझे भी याद नहीं रहते इसलिये पूछना पड रहा है कि, इनमें से कौन से देखा?

इस्लामिक पुस्तकों के अतिरिक्‍त छ अल्लाह के चैलेंज
islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)

मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध् मैत्रे, अंतिम ऋषि (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा
antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog)